salil shankar

May 16, 2024

Not much

कुछ ख़ास ज़्यादा ज़रूरी नहीं है,
थोड़ी सी बारिश,
थोड़ी सी धूप,
थोड़ी सी साँस,
थोड़ी सी राहत।

अपने कमरे में,
यूँ ही लेटे रहने की,
खिड़की के बाहर,
बारिशों के बादल देखने की ख़ुशी मिलती रहे, 
हल्के मन से,
दिन बिताने की तसल्ली मिलती रहे।

तकलीफ़ तो कुछ गहरी अंदर हैं,
कुछ बाहर भी,
पर इतनी लड़ाई कौन लड़े?
चार साल रह गये जीने को,
बेकार की खिंचाई कौन करे?

कुछ बारिश सी होगी शायद,
मन में कोई और ख़्याल नहीं है,
बस खिड़की के बाहर देखते रहने का दिल कर रहा है,
अभी कोई टोकने वाला नहीं है,
कुछ बारिश सी होगी शायद,
इससे कुछ ख़ास ज़्यादा ज़रूरी नहीं है।

--
salil