दिन शुरू होते हैं,
काम शुरू होता है,
कुछ बातें होती हैं,
कुछ ख़ुशियाँ,
कुछ झगड़े,
कई मतलब निकलते हैं,
कई कहानियाँ बनती हैं ।
गलियों में शायद साइकल यूँ ही लेकर निकले थे,
शायद कोई अच्छी नयी बात मिल जाती,
क्या पता सच ही मिल जाता,
न तो सच मिला न बातें,
मिले तो पचास धक्के,
कुछ कहानियाँ,
और दुनिया भर की फ़िज़ूल की बातें।
घर भी यूँ घर सा नहीं लगता,
साँसे भी कुछ चलती हैं कुछ नहीं,
कई बार समझ नहीं आता,
चलें वापस,
या चलते रहें ।
कुछ ठंडक सी है बाहर,
मई यूँ तो गर्मी का महीना है,
फिर भी कुछ ठंडक सी है ।
क्या अपना और क्या नहीं,
क्या ग़लत और क्या सही,
ढूँढ रहे हैं किसी कहानी जैसे सच को,
पर मिलती हैं सिर्फ़ कहानियाँ,
बरसे हुए बादल,
कुछ बारिश से भीगे पहाड़,
किनारों पे मथ्था टेकता दरिया,
और ना जाने कौन सा आसमाँ ।
काम शुरू होता है,
कुछ बातें होती हैं,
कुछ ख़ुशियाँ,
कुछ झगड़े,
कई मतलब निकलते हैं,
कई कहानियाँ बनती हैं ।
गलियों में शायद साइकल यूँ ही लेकर निकले थे,
शायद कोई अच्छी नयी बात मिल जाती,
क्या पता सच ही मिल जाता,
न तो सच मिला न बातें,
मिले तो पचास धक्के,
कुछ कहानियाँ,
और दुनिया भर की फ़िज़ूल की बातें।
घर भी यूँ घर सा नहीं लगता,
साँसे भी कुछ चलती हैं कुछ नहीं,
कई बार समझ नहीं आता,
चलें वापस,
या चलते रहें ।
कुछ ठंडक सी है बाहर,
मई यूँ तो गर्मी का महीना है,
फिर भी कुछ ठंडक सी है ।
क्या अपना और क्या नहीं,
क्या ग़लत और क्या सही,
ढूँढ रहे हैं किसी कहानी जैसे सच को,
पर मिलती हैं सिर्फ़ कहानियाँ,
बरसे हुए बादल,
कुछ बारिश से भीगे पहाड़,
किनारों पे मथ्था टेकता दरिया,
और ना जाने कौन सा आसमाँ ।
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salil
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